Published On: Mon, Aug 7th, 2017

एक उभरते सितारे का अवसान

nitish modiयह देखकर देशवासी स्तब्ध हैं कि कैसे बिहार में नीतीश कुमार ने सर्कस के बाजीगर सरीखे करतब दिखाते हुए पहले तो अपने पुराने मित्र लालू यादव की झोली से छिटककर मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे डाला और फिर 24 घंटों के अंदर ही भाजपा के कंधे पर चढ़कर उसी गद्दी पर दोबारा आन बैठे। ऐसा करके उन्होंने राजनीतिक अवसरवादिता और दगाबाजी के बीच जो महीन रेखा होती है, उसे पार कर लिया है।
वास्तव में इस प्रकरण से बिहार और बाकी देश में संदेश गया है कि यह नीतीश ही हैं, जिन्होंने अपने गठबंधन-सहयोगी लालू प्रसाद यादव के साथ छल किया है। यही वजह है कि चार दिन बाद उन्हें यह सफाई देनी पड़ी कि इसके सिवा कोई विकल्प नहीं बचा था। हालांकि नीतीश कुमार के पास यह मौका जरूर था कि वह चाहते तो लालू के बेटे तेजस्वी यादव को उपमुख्यमंत्री के पद से हटा देते और बाद में यदि इस वजह से गठबंधन में कोई समस्या होती तो उसे हल किया जा सकता था।
अब जबकि इस बवंडर की धूल बैठने लगी है तो इस घटनाक्रम का क्या परिणाम होगा और नीतीश कुमार का गणित क्या है, यह साफ होने लगा है। अपने इस कदम से नीतीश कुमार ने महज दो साल पहले बिहार की जनता द्वारा भाजपा के विरुद्ध दिए गए जनमत को उलटते हुए उसे दोहरी जीत दिलवा दी है, साथ ही उनका अपना रुतबा भी लोगों की नजरों में कम हो गया है और आइंदा वे भाजपा नेतृत्व के रहमोकरम पर रहेंगे।

एस. निहाल सिंह

दरअसल नीतीश कुमार इस पाला बदल के लिए पिछले कुछ समय से तैयारी कर रहे थे। पहले उन्होंने नोटबंदी पर केंद्र सरकार का साथ दिया जबकि सारा विपक्ष इसके विरोध में लामबंद होकर आवाज उठा रहा था। उसके बाद राष्ट्रपति चुनाव में भी विपक्ष के संयुक्त उम्मीदवार की बजाय उन्होंने भाजपा प्रत्याशी को अपना समर्थन दिया। एक तरफ विपक्ष द्वारा आयोजित बैठकों में भाग लेने के वास्ते जहां उनके पास वक्त नहीं होता था वहीं दूसरी ओर वे प्रधानमंत्री मोदी के साथ दोपहर या रात का भोजन करते हुए नजर आए।
नीतीश कुमार का हालिया कदम शायद इस सोच से उपजा है कि 2019 के आम चुनाव में प्रधानमंत्री मोदी के सामने संयुक्त विपक्ष का उम्मीदवार बनकर खड़े होने का मतलब होगा हारी हुई लड़ाई लड़ना और नतीजे में राजनीतिक वनवास झेलना। इसका संकेत उनकी भविष्यवाणी से पता चलता है कि समूचा विपक्ष मिलकर भी 2019 में मोदी की लोकप्रियता के सामने नहीं टिक पाएगा। अतएव एक साहसिक टक्कर देने की बजाय उन्होंने निजी हित बचाए रखने को तरजीह दी है। इस प्रक्रिया में उन्होंने अपने कुछ समर्थकों को हैरान-परेशान कर डाला है, खासकर वरिष्ठ नेता शरद यादव को।
यूं तो कालांतर में भी नीतीश कुमार उदारवादी नेता अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व काल में केंद्र और बिहार में उनके साथ खड़े रहे थे। पहले उन्होंने स्वतंत्र रूप से बिहार का राजकाज चलाने में उल्लेखनीय काम कर दिखाया है। लेकिन आगे चलकर उन्होंने समझौते भी किए हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में उनका जनता दल (यूनाइटेड) लालू यादव के आरजेडी की अपेक्षा कम सीटें जीत पाया था। मुख्यमंत्री बनने की एवज में नीतीश कुमार को लालू यादव के दो अर्द्ध-शिक्षित पुत्रों को मंत्रिमंडल में लेना पड़ा था, जिनमें से एक को उपमुख्यमंत्री का पद दिया गया था। इसके अलावा लालू की बेटी को गठबंधन कोटे से राज्यसभा की सीट भी दी गई है। जैसा कि सारी दुनिया जानती है लालू यादव राजनीति को पारिवारिक व्यवसाय की तरह लेते हैं। चूंकि नीतीश कुमार के पास समय कम बचा था, इसलिए उन्होंने भाजपा के साथ गठबंधन बनाने वाला यह असाधारण काम कर डाला।
इस घटनाक्रम से अहम सवाल यह पैदा होता है कि अब विपक्ष के उस प्लान का क्या होगा, जिसमें वह बिहार में हुए अच्छे कामों को 2019 के आम चुनाव में जनता के सामने रोल-मॉडल बनाकर पेश करने की सोच रहा था। अब वह मॉडल ध्वस्त हो चुका है और उनके अपने बीच कई तरह के झगड़े निपटाने को बाकी हैं।  विपक्ष के लिए यही समय है कि संघ परिवार के कमजोर बिंदुओं पर चोट करने वाली रणनीति का प्रारूप तैयार किया जाए।
पिछले तीन सालों से जब से भाजपा की सरकार केंद्र में आई है या उससे पहले कई राज्यों में सत्ता में है, तब से लेकर उसकी सबसे बड़ी खामियों में सबसे ऊपर है कृषि क्षेत्र की उपेक्षा, जिसकी वजह से किसानों की मुसीबतें और खुदकुशियां बढ़ती जा रही हैं। इसके अलावा अन्य कमजोरियों में शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में कम धन का प्रावधान किया जाना है। युवा शक्ति का प्रयोग अगरचे कहीं इस सरकार ने किया है, वह है उनमें उन्माद भरने का, जिसके तहत एक तो सच्चे-झूठे गोरक्षक बना दिए गए हैं जो आए दिन पशुधन ले जाने वालों से मारपीट करते हैं, जिनमें कई मौतें भी हो चुकी हैं। दूसरा है, युवा मनों में अपनी किस्म के हिंदू भारत बनाने का खुमार भर देना। कहां तो एक भाजपा-शासित राज्य में गो माता के लिए एंबुलेंस का प्रावधान चोखा पैसा खर्च करके किया जा रहा है तो वहीं इसी दल के शासन वाले ऐसे राज्य हैं जहां गरीबों को वाहन के अभाव में अपने मृत परिजनों को कंधों या साइकिल पर ढोना पड़ रहा है।
हालांकि कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों के सांसद गाहे-बगाहे इन मुद्दों को संसद में उठाते रहे हैं, लेकिन समय की दरकार है कि सरकार के इस कमजोर पक्ष को भुनाते हुए जमीनी स्तर पर ठोस काम करते हुए अपने लिए मजबूत जनमत तैयार किया जाए। जहां भाजपा ने एक दलित को राष्ट्रपति बनाकर इस वर्ग को खुश करने का प्रतीकात्मक ढंग अपनाया है वहीं देश का दलित समुदाय उनके साथ हिंदू राष्ट्रवादियों द्वारा किए जा रहे बुरे बर्ताव से आहत है।
केंद्र में सत्ता में आने से पहले भाजपा के बारे में मशहूर था कि यह कुछ जाति विशेष की बहुलता वाली शहरी पार्टी है, रिवायती तौर पर इसमें ब्राह्मण और बनिया बिरादरी के लोग अन्य जातियों की एवज में उच्च पदों पर रहे हैं। इसका उदाहरण हाल में हरियाणा और उत्तर प्रदेश में बनी सरकारें हैं। राष्ट्रीय स्तर पर अपना वर्चस्व बनाने की महत्वाकांक्षा होना स्वाभाविक है लेकिन एक दलित को राष्ट्रपति के पद पर बिठाकर और अध्यक्ष अमित शाह का हरिजनों के घर जाकर खाना खाने वाले सांकेतिक कामों से अधिकांश दलितों को मूर्ख नहीं बनाया जा सकता।
उधर विपक्ष की अपनी दुविधाएं हैं। पस्त पड़ी वयोवृद्ध पार्टी कांग्रेस की मुख्य समस्या शीर्ष पर करिश्माई नेता का न होना है, राहुल गांधी पार्टी के लिए थाती न होकर, बोझ ज्यादा हैं। बंगाल में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की सारी ऊर्जा राज्य में भाजपा के बढ़ते प्रभाव को रोकने और अपने वर्चस्व को बचाने में खर्च हो रही है। तमिलनाडु में अगर एआईएडीएमके के दोनों धड़े एका नहीं करते तो वहां चल रहे राजनीतिक भंवर का फायदा उठाकर भाजपा अपने पांव जमाने की कोशिश में है, लेकिन विडंबना यह है कि जयललिता की मौत के बाद उसकी स्वघोषित उत्तराधिकारी शशिकला, राजनीतिक सूझबूझ की बजाय कारावास में जेलरों को रिश्वत देकर अपने लिए सुविधाएं जुटाने की खबरों की वजह से चर्चा में ज्यादा हैं।
जो एक संकेत भाजपा और संघ परिवार दे रहे हैं कि जब बात राजनीतिक शक्ति प्राप्त करने की आएगी तो उनके लिए नियम और नैतिकता कोई मायने नहीं रखते। अगर बहुमत कम पड़ जाएगा तो जोड़-तोड़ या लालच दे-दिलाकर अपनी सरकार किसी न किसी तरह बना ली जाएगी। गोवा और मणिपुर इसका जीवंत उदाहरण हैं। बिहार में भी हमें देखने को मिला है कि कैसे विपक्ष के एक धड़े को लुभाकर अपने साथ मिला लिया गया और इसकी एवज में सरकार चलाने के वास्ते समर्थन दे दिया।
संक्षेप में कहें तो जिस किस्म का प्रशासन अमेरिका में ट्रंप चला रहे हैं, उसी तर्ज पर मोदी देशभर में अपनी पार्टी की सरकार कायम करने पर आमादा हैं। फिलवक्त उनका दल भारत को अपनी सोच वाला राष्ट्र बनाने वाले ध्येय में जुटा हुआ है। ऐसे में नैतिकता का क्या है, वह अपना ख्याल खुद रखेगी।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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