Published On: Sat, Oct 21st, 2017

पाक पर भारी भारतीय कूटनीति

संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान की राजदूत मलीहा लोधी पाक में तथा बाहर सुर्खियों में रहने वाली, महत्वाकांक्षी तथा वाचाल व्यक्ति के रूप में जानी जाती हैं। लोधी को  इस्लामाबाद में संपादक पद के दिनों से सेना के करीब माना जाता रहा है। वह 1990 के दशक में बेनज़ीर भुट्टो के भी करीब रहीं, लेकिन मलीहा की नवाज शरीफ के साथ प्रधानमंत्री के रूप में पहले दो कार्यकाल के दौरान बिल्कुल नहीं बनी। अंदरूनी सूत्रों का मानना है कि नवाज शरीफ प्रधानमंत्री के तीसरे कार्यकाल के दौरान सेना के ‘समझाने’ पर उन्हें संयुक्त राष्ट्र में राजदूत बनाने के लिए राजी हुए। अमेरिका में दो बार पाकिस्तान की दूत रह चुकीं लोधी ने सोचा कि भारत विरोधी अपनी करीबी दोस्त रॉबिन राफेल के रहते वाशिंगटन में अपने कई दोस्तों की मदद से जम्मू-कश्मीर के मुद्दे को एक बार फिर संयुक्त राष्ट्र के एजेंडे में शामिल करवाकर न्यूयार्क में अपने कार्यकाल को नयी बुलंदियों पर ले जाएंगी।
लोधी ने पाक के अंतरिम प्रधानमंत्री शाहिद खकान अब्बासी को न्यूयार्क में भारत के खिलाफ आरोप लगाने के लिए राजी कर लिया। अब्बासी ने भी हमेशा की तरह जम्मू कश्मीर में मानवाधिकारों के कथित उल्लंघन तथा अप्रासंगिक संयुक्त राष्ट्र प्रस्तावों का राग अलापना शुरू कर दिया। लेकिन पाकिस्तानी न्यूयार्क में कभी भी शिमला समझौते की बात नहीं करते!! भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने भी पाकिस्तान के आतंकवाद का प्रायोजक होने संबंधी रिकॉर्ड की तरफ सबका ध्यान आकर्षित करते हुए पाकिस्तान के आरोपों का जवाब दिया।
उन्होंने कहा कि भारत जहां ऐसे संस्थानों का निर्माण कर रहा है, जिन पर ‘दुनिया फख़्र कर सकती है।’ जबकि पाकिस्तान ने सिर्फ लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद, हिज्बुल मुजाहिदीन तथा हक्कानी नेटवर्क जैसे आतंकी गुटों के ‘आतंकवादी तथा आतंकवादी शिविर’ ही तैयार किये हैं। लेकिन एक बात जो कि लोधी को  गहरे तक परेशान कर गई, वह थी युवा भारतीय फर्स्ट सेक्रेटरी ईनाम गंभीर द्वारा पाकिस्तान का ‘टेररिस्तान’ के रूप में वर्णन करना। इससे भड़की मलीहा लोधी तब दुनिया भर में हंसी की पात्र बन गई। पाक मीडिया ने भी उन्हें खूब खरी-खोटी सुनाई जब उन्होंने संयुक्त राष्ट्र महासभा में इस्राइली गोलीबारी में घायल हुई फिलिस्तीन की एक युवती के चित्र को दिखाकर दावा कर डाला कि यह चित्र कश्मीर में भारत की ज्यादतियों को उजागर करता है।
ऐसे में बढ़ते अलगाव से जूझ रहे पाकिस्तान के साथ कोई कैसा बर्ताव करेगा जब वहां एक हास्यास्पद मुकदमे के चलते अपने चुने गये नेता नवाज शरीफ के नेतृत्व से ही वंचित कर दी गई सरकार का शासन हो, जहां जांचकर्ताओं में सेना की गुप्तचर सेवा के सदस्य शामिल होते हों, और न्यायपालिका भी सेना की अंगुलियों पर नाचती हो? यह स्पष्ट है कि सेना का नवाज शरीफ को सत्ता में वापसी करने देने का कोई इरादा नहीं है। सेना के जनरल इस बात पर दृढ़ संकल्प हैं कि न्यायपालिका उन्हें 2018 के आम चुनाव में भाग लेने के अयोग्य करार दे दे। बहरहाल, शरीफ को रिपोर्ट करने वाला गुप्तचर ब्यूरो आतंकी संगठनों के समर्थन के लिए आईएसआई को जिम्मेदार ठहराने की कोशिश में है। उधर, पाकिस्तान का विदेशी मुद्रा भंडार भी तेजी से कम होता जा रहा है। पाक के अर्थशास्त्री भी चीन के ‘वन बेल्ट वन रोड’ प्रोजेक्ट की वजह से पैदा होने वाली दूरगामी समस्याओं के बारे में आगाह कर रहे हैं, क्योंकि पाकिस्तान को 50 बिलियन डॉलर कर्ज का भुगतान भी चीन को शीघ्र ही लौटाना होगा और वो भी लगभग कमर्शियल ब्याज दर के साथ। इसके उलट जापान भारत को लंबी अवधि के लिए ऋण मुहैया करवाता है और वो भी नाममात्र के ब्याज पर। अमेरिकी विद्वान एश्ले टेलिस अमरिका में उप-महाद्वीप के सामरिक अध्ययन के बारे में प्रतिष्ठित विश्लेषक के रूप में जाने जाते हैं। हाल ही में प्रकाशित एक अध्ययन में उन्होंने कहा है कि ‘भारत तथा पाकिस्तान के बीच निरंतर बातचीत’ के लिए किये जाने वाले नियमित आह्वान ‘भ्रमित’ तथा ‘प्रतिकूल साबित होने वाले’ होते हैं। टेलिस कहते हैं कि दोनों देशों के बीच मतभेदों को पाकिस्तान की अदूरदर्शिता, एक बड़ी ताकत के रूप में भारत को नष्ट करने तथा भारतीय सेना की पिछली सैन्य जीतों का बदला लेने की पाकिस्तानी सेना की हसरत के कारण बढ़ावा मिलता है। वह आगे कहते हैं कि पाकिस्तानी सेना चाहती है कि ‘क्षमताओं, उपलब्धियों तथा संभावनाओं में भारी अंतर के बावजूद उसके साथ भारत के बराबर व्यवहार किया जाना चाहिए।’ पेंटागन तथा व्हाइट हाउस के वरिष्ठ अधिकारी टेलिस के इन विचारों से इत्तेफाक रखते हैं।
पाक समर्थक जॉन मैकेन जैसे सीनेटर भी यह कहने लगे हैं कि पाक के दोगलेपन के कारण अब उनका धैर्य भी खत्म होता जा रहा है। अमेरिकी रक्षा सचिव जनरल मैटिस का भारत तथा अफगानिस्तान का ही दौरा करने तथा पाकिस्तान को जानबूझकर नज़रअंदाज कर देना इस बात को प्रमाणित करता है लेकिन ट्रंप प्रशासन की नीतियों में निरंतरता के प्रति आश्वस्त होकर न बैठना ही भारत के लिए समझदारीपूर्ण होगा। महत्वपूर्ण है कि मैटिस के भारत तथा अफगानिस्तान के दौरे तुरंत बाद पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा एक सैन्य प्रतिनिधमंडल के साथ अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ ग़नी से मिलने काबुल जा पहुंचे।

जी.पार्थसारथी

जी.पार्थसारथी

भारत को मौजूदा घटनाओं का फायदा उठाने के लिए ठोस राजनयिक प्रयास करने होंगे।  किसी तरह की बातचीत की अगर बात हो तो यह लगभग पूरी रह आतंकवाद पर केंद्रित होनी चाहिए। साथ ही भारत को पाकिस्तान के लोगों, विशेषकर भारत में इलाज की जरूरत वाले बच्चों  की मानवीय जरूरतों को पूरा करते हुए उसके साथ बेहतर रिश्तों की इच्छा रखने वाले पाकिस्तानी लोगों तथा संगठनों से भी संपर्क साधना चाहिए। कूटनीतिक तौर पर भारत को अफगानिस्तान के साथ साझा हित की बात कर इस बात पर जोर देना चाहिए पाकिस्तान अमेरिका का ‘विश्वास’ जीतने के लिए न केवल आतंकवादी संगठनों को अस्थायी तौर पर ठंडे बस्ते में डाल देता है, बल्कि उन्हें हटा तथा ध्वस्त भी कर देता है। इन आतंकी संगठनों में अफगानिस्तान में सक्रिय तालिबान तथा हक्कानी नेटवर्क से लेकर भारत के खिलाफ काम करने वाले लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद और हिज्बुल मुजाहिदीन जैसे संगठन शामिल हैं। हमें चीन को ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान पाकिस्तान पर नामित आतंकवादी समूहों पर कार्रवाई का दबाव डालने के लिए अपनी जिम्मेदारी को पूरा करने का वादा भी याद दिलाना होगा। अंतरराष्ट्रीय समुदाय तथा विश्व बैंक जैसे बहुपक्षीय वित्तीय संस्थानों को भी पाकिस्तान को विकास के लिए दिये जाने वाले पैसे को आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई के साथ जोड़ने के लिए कहा जाना चाहिए।
सर्दियों की बर्फ जल्द ही कश्मीर में हिमालय के पर्वतीय रास्तों को बंद कर देगी। लेकिन 2018 में जब तक बर्फ पिघले, तब तक भारत को नियंत्रण रेखा के उस पार से घुसपैठ से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए प्रभावी गुप्त उपायों के साथ पहले ही तैयार रहना होगा।

(लेखक पूर्व राजनयिक हैं)

सौ. दैनिक