Published On: Wed, Jul 12th, 2017

मॉनसून में रखें सेहत का ख्याल

सेहतभीषण गरमी के बाद मॉनसून के आने से मौसम सुहावना हो चला है, मगर यही वह मौसम है जब थोड़ी भी लापरवाही सेहत को गंभीर नुकसान पहुंचा सकती है. बरसात में जलजमाव होने से गंदगी हर तरफ फैल जाती है. ऐसे में मच्छर, बैक्टीरिया और वायरस के संक्रमण का खतरा बढ़ जाता  है. इस मौसम में मलेरिया, टायफायड, वायरल फ्लू, जॉन्डिस, सर्दी-जुकाम आदि हो सकते  हैं, वहीं कुछ लोग पेट  से  संबंधी समस्या से भी परेशान रहते हैं. इस मौसम में बच्चों का खास ख्याल रखना भी जरूरी है, क्योंकि बड़ों के मुकाबले उनकी इम्यूनिटी कमजोर होती है. इस मौसम में अपना ख्याल कैसे रखें, बता रहे हैं हमारे विशेषज्ञ.
शहरों में बरसात ज्यादा तबाही लेकर आती है, क्योंकि पॉलीथीन से नाले जाम हो जाते हैं. इससे गंदा पानी सड़कों पर आ जाता है. नाले के पानी में पैर ज्यादा देर भीगे रहने से कई तरह के फंगल डिजीज हो जाते हैं. बरसाती मौसम में मच्छरों का प्रकोप भी बढ़ जाता है. ये मच्छर मलेरिया, डेंगू, चिकनगुनिया और जैपनीज इन्सेफ्लाइटिस के प्रमुख कारक हैं. बरसात के मौसम में ह्यूमिडिटी ज्यादा होने के कारण कपड़े नहीं सूखते और उनमें बैक्टीरिया पनपने लगता है, जो वायरल बुखार, सिर दर्द, फंगल रोग का कारण है. दूषित जल और खाने के सेवन से टायफॉयड का भी खतरा होता है, जो Salmonella typhi बैक्टीरिया के शरीर में प्रवेश करने से होता है. इससे डायरिया, हैजा, फंगल इन्फेक्शन जैसे जलजनित रोग भी होते हैं.
चूंकि, टायफायड बैक्टीरिया जनित रोग है और वायरल फीवर वायरस से होता है. इसलिए दोनों का इलाज अलग-अलग होता है. टायफायड, मलेरिया और वायरल फीवर के लक्षण करीब-करीब एक जैसे होते हैं. सभी में बुखार, सर्दी-जुकाम आैर सिर दर्द पाया जाता है. हालांकि, टायफायड में शरीर में दर्द अधिक होता है. रोगी सर्दी-जुकाम की जगह सिर दर्द की शिकायत ही करते हैं. टायफायड तीन साल से ऊपर के बच्चों को ही होता है, जबकि इंफ्लूएंजा या फ्लू नवजात से लेकर बुजुर्ग तक को हो सकता है. इंफ्लूएंजा यदि नवजात को हो, तो उसे सांस लेने में तकलीफ होती है. वह हांफने लगता है. इसका समय पर इलाज न होने से दमा रोग होने का खतरा होता है. टायफायड और मलेरिया के कीड़े का पता चार-पांच दिन के बाद ही चलता है, जबकि डेंगू की बात की जाये, तो उसके वायरस का पता पहले दिन से ही चल जाता है.
बरसात में जरूरी संक्रमण से बचाव
बरसात में वायरल बुखार आम बात है. इसके लक्षण अन्य बुखार की तरह ही हैं. अचानक तेज बुखार, सिर दर्द, बदन दर्द, सूखी तेज खांसी, जुकाम, गले में खराश, नाक से पानी आना, छींक आदि होने लगता है. शरीर का तापमान 101 से 103 डिग्री या और ज्यादा हो सकता है. कुछ वायरल बुखार तीन दिन में, कुछ पांच दिन में और कुछ सात दिन में उतरते हैं. सात दिनों से अधिक वायरल बुखार नहीं रहता. यदि ऐसा हो, तो इलाज बुखार को कम रखने के लिए ठंडे पानी की पट्टी का इस्तेमाल करें और डॉक्टर से मिलें. पैरासिटामोल ले सकते हैं, लेकिन डॉक्टर को दिखा जरूर लें.
डेंगू होने पर घबराएं नहीं
बरसात में मच्छरों का प्रकोप बढ़ जाता है. इसलिए इस मौसम में वायरल फीवर होने पर भी लोग उसे डेंगू समझ कर घबरा जाते हैं. हालांकि, डेंगू की जांच और उसका इलाज आसानी से हो जाता है. इसके लिए एंटीजेन की जांच की जाती है. आम तौर पर जब डेंगू होता है, तो प्लेटलेट्स एक लाख के ऊपर रहता है और धीरे-धीरे घटता है. जब प्लेटलेट्स 20 हजार के नीचे चले जायें, तो सतर्क हो जाएं. पपीता का पत्ता चबाने या पपीता का फल खाने से लाभ मिलता है. रोगी की हालत यदि नाजुक हो, तो प्लेटलेट्स चढ़ाया जाता है और कुछ दवाइयां दी जाती हैं, जिससे वह पूरी तरह ठीक हो जाता है. सभी बरसाती और मच्छर जनित रोगों से बचने के लिए साफ-सफाई के साथ खान-पान पर भी विशेष ध्यान देना जरूरी है.
प्रस्तुति : सौरभ चौबे