Published On: Sun, May 14th, 2017

दुनिया को बतायें पाक के मंसूबे

कश्मीरी पाकिस्तानीजब भीतरी और बाहरी सुरक्षा की चुनौतियां दरपेश हों तो ज्यादा जरूरी मन की नहीं, जानो-तन की बात हो जाती है। इसी वाक्य को दोहराते रहने की जरूरत नहीं रह जाती कि क्या करें, पड़ोस बदला नहीं जा सकता। तब छाती ठोक कर जता देना चाहिए कि दुष्ट पड़ोसी का दिमाग तो ठिकाने लगाया जा सकता है। इतिहास के इस सच को भी दोहराना अपरिहार्य हो जाता है कि पड़ोसी का भू-राजनीतिक नक्शा बदल कर रख दिया जाए। जैसा कि 1962 में असावधान जवाहरलाल नेहरू की पीठ में छुरा घोंप कर चीन ने भारत के अक्साई चिन का और 1971 के अंत में इंदिरा गांधी ने पाकिस्तान का बदल दिया था। न सिर्फ बदला था बल्कि बंगाली मुक्तिवाहिनी की ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ में हाथ बंटाकर उपमहाद्वीप में नये राष्ट्र बांग्लादेश को जन्म दे दिया था। उदाहरण और भी हैं, लेकिन फिलहाल बात कश्मीर पर केंद्रित की जाए।
16 दिसंबर 1971 से हर तरह झुलसता और करवट बदलता हुआ पाकिस्तान अपनी शर्मनाक हार का बदला हमसे कश्मीर में लेना चाहता है। वह एक साथ तीन मोर्चेबंदियां कर रहा है। पहली कश्मीर में महजबी जुनून भड़का कर और हमारी तरुणाई को गुमराह करके, और हुर्रियत के लालची और सुविधाभोगी नेताओं की वित्तीय मदद से भारत के खिलाफ छाती पीटते रहने की रह-रहकर रिहर्सल कराते रहने की।
पिछले दिनों उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में गिरफ्तार किये गये पाक फौजी खुफिया एजेंसी आई.एस.आई. के अल्ताफ, आफताब और जावेद जैसे एजेंटों ने पूछताछ में बताया कि उन्हें दिल्ली में सक्रिय पाकिस्तानी उच्चायुक्त मुहम्मद बासित के माध्यम से कश्मीर घाटी सहित भारत के विभिन्न हिस्सों में आतंकी हमलों के लिए भरपूर धन मुहैया किया जाता रहा है। इन दिनों सबसे मोटी रकम शब्बीर शाह को मिलने के दस्तावेजी सबूत भी प्राप्त हुए। राजनयिक प्रावधानों का जिरह बख्तर धारण किये हुए जनाब बासित की कलई जब खुलने लगी तो दुनिया भर से लानतों की बारिश शुरू होते ही उनकी जगह सोहेल महमूद की भारत में पोस्टिंग की खबर जारी कर दी गई।
दूसरा मोर्चा है पाकिस्तानी सेना द्वारा भारत सहित अन्य पड़ोसियों को रह-रहकर जख्म पहुंचाते रहने के लिए आतंकवादियों को सक्रिय सहयोग देने का। भारतीय सीमाओं में घुसपैठ कर हमारे जवानों पर इक्का-दुक्का हमले करके उनके शव क्षत-विक्षत करने की शैतानी वारदातें करते रहना पाकिस्तान का मुख्य काम हो गया है। भारत के अलावा ईरान और अफगानिस्तान को हलकान करते रहना भी पाकिस्तान की दिनचर्या में शामिल है। उसने खुद दावा किया है कि उसकी फौज ने 50 अफगान सैनिकों की हत्या कर दी है। पाक फौजियों की सरपरस्ती में जुनूनी दहशतगर्दों द्वारा ईरान में की जाती रही वारदातों से तंग आकर वहां के सेनाध्यक्ष ने रविवार को दो टूक कह दिया कि पाकिस्तान पर भी जवाबी हमला किया जा सकता है। भारत इन दोनों देशों का भरोसा जीत सकता है।
अपनी पीठ पर शक्तिमान चीन का हाथ होने से इतराते हुए पाकिस्तान ने कूटनीतिक मोर्चे पर भारत विरोधी अभियान चला रखा है। इसमें कुछ इस्लामी देशों का भावनात्मक सहयोग उसे मिला है। जैसे कि गत सप्ताह तुर्की के सत्ता प्रमुख एर्दोगन ने कश्मीर मुद्दे के अंतर्राष्ट्रीयकरण के मकसद से एक जुमला उछाल दिया। परंतु कुल मिलाकर यहां भी पलड़ा भारत का ही भारी रहा। रविवार को जापान और भारत में सामरिक सहयोग बढ़ाने पर सहमति बनी। पाकिस्तान जैसे जुनूनी मुल्कों की नकेल कस के रखने वाला छोटा-सा देश इस्राइल खुलकर भारत के साथ खड़ा हो गया है। दक्षिण कोरिया और म्यांमार से भारत के अच्छे दोस्ताना संबंध हैं। फिर भी यह समय भारत के राजनय और विदेश नीति की अग्निपरीक्षा का है। दक्षिणी कश्मीर में अलगाव का जो वातावरण अनेक कारणों से बना है, उसे ‘कश्मीरियत, जम्हूरियत और इनसानियत’ की दुहाई देते रहने मात्र से दुरुस्त नहीं किया जा सकता। यह काम तो बुनियादी तौर पर राज्य सरकार का है। लेकिन जिस तरह से मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने पानी सिर के ऊपर से गुजरते देखकर हाथ खड़े करते हुए कह दिया है कि अब इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही संभाल सकते हैं, तब मोदी को भाजपा का चुनावी दिग्विजय अभियान पार्टी अध्यक्ष अमित शाह को सौंपकर कश्मीर समस्या के समाधान को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए। सामरिक रणनीति और राजनय विशेषज्ञों की राय लेते हुए बहुआयामी ठोस पहल करनी चाहिए।
विश्व बिरादरी भारत और पाकिस्तान में बनती टकराव की स्थितियों के प्रति इसलिए भी सजग है कि दोनों परमाणु शक्ति संपन्न देश हैं। दोनों में बढ़ते तनाव की खबरों के बीच संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव अंतोनियो गुजरेस ने दोनों देशों में बातचीत का दौर शुरू करने पर जोर दिया है। पाकिस्तानी सैनिकों द्वारा पिछले दिनों नियंत्रण रेखा के इस पार भारतीय गश्ती दल पर कृष्णा घाटी सेक्टर में किये गये हमले से जो तनाव बढ़ा है, उससे स्थितियां विस्फोटक होने की आशंका व्यक्त की जा रही है। यद्यपि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का ध्यान फिलहाल उत्तरी कोरिया के सनकी तानाशाह किम उन जोंग को धूल चटाने पर केंद्रित है, फिर भी पेंटागन द्वारा भारत-पाक में बढ़ते तनाव को गंभीरता से लिया जा रहा है। उचित होगा अमेरिका द्वारा भी पाकिस्तान की समय रहते नकेल कसी जाए। चीन दोनों देशों में फिलहाल सैन्य टकराव नहीं चाहेगा, क्योंकि पाक अधिकृत कश्मीर होते हुए उसका जो आर्थिक गलियारा तेजी से बन रहा है, उसमें वह इस वक्त कोई व्यवधान पसंद नहीं करेगा।

रमेश नैयर

प्रधानमंत्री को नेशनल कानफ्रेंस के फारूख अब्दुल्ला और कांग्रेस के गुलाम नबी आजाद सरीखे वरिष्ठ राजनेताओं से कश्मीर में स्थितियां सामान्य बनाने में सहयोग की अपील करनी चाहिए। संपर्क और संवाद की राह तलाशनी चाहिए। अत्यंत वरिष्ठ और अनुभवी नेता फारूख अब्दल्ला केंद्र में एन.डी.ए. तथा कांग्रेसनीत सरकारों में मंत्री रह चुके हैं। वह इस सच से गाफिल नहीं होंगे कि जिस पाकिस्तान के झंडे अलगाववादी आतंकी घाटी में लहराते हैं, उस पाकिस्तान और पाक-अधिकृत कश्मीर के अवाम के हालात क्या हैं? ऐसा क्यों होता है कि जब कांग्रेस अथवा नेशनल कानफ्रेंस सत्ता में नहीं होती तो उसके नेता भी अलगाववादियों की भाषा बोलने लगते हैं?
इस तथ्य को वे भी बखूबी जानते होंगे कि पाकिस्तान अपनी अंदरूनी अशांति, बलूचिस्तान में मानवाधिकारों के हनन और जम्हूरियत की छाती पर मूंग दलती वहां की आई.एस.आई. की करतूतों की तरफ से ध्यान बंटाने के लिए कश्मीर मुद्दे के शोशे को रह-रहकर उछालता रहता है। भारत को विश्व बिरादरी तक इस सच को पहुंचाना चाहिए। जिस तरह से आई.एस. का दखल कश्मीर घाटी में बढ़ने की सूचनाएं मिल रही हैं, उनसे भी अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोप को आगाह करना उपयोगी होगा।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)