Published On: Mon, Mar 6th, 2017

रामजस में प्रतिरोध के निष्कर्ष

studentदेश की छात्र राजनीति का यह पुराना टोटका रहा है कि छात्र संगठन अक्सर शहर के कुछ बलिष्ठ या गुंडे विद्यार्थी किस्म के लोगों का झुंड अपने आसपास इकट्ठा करके प्रभावित करते हैं कि उन्हें एहसास दिलाया जाए कि इस तगड़े संगठन से जुड़ना ज्यादा मुफीद रहेगा। पश्चिम बंगाल के कैंपसों में दीगर वामपंथी गुटों ने पहले-पहल इस फार्मूले के अतिवादी स्वरूप का प्रयोग किया था, बाद में इसका इस्तेमाल राज्यस्तरीय राजनीति में किया जाने लगा था। आरंभिक भूमि सुधार लहर और गुंडा-सेना की बदौलत मार्क्सवादी वामपंथी उस राज्य में दशकों तक फले-फूले थे।
दिल्ली के रामजस कॉलेज में हुए झगड़े को राष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्धि इसलिए नहीं मिली कि वहां बस्तर के आदिवासियों की हालत पर होने वाले सेमिनार में जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के छात्र नेता उमर खालिद को बतौर एक वक्ता बुलाया गया और जिसका विरोध अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद कर रही थी बल्कि मशहूरी की वजह छात्र संगठनों के बीच हुई बहस का हिंसक लड़ाई में तबदील हो जाना था। यहां यह बताना महत्वपूर्ण होगा कि अधिकांश छात्र एबीवीपी द्वारा पेश की जाने वाली राष्ट्रवाद की परिभाषा के विरुद्ध एकजुट हो गए।
उमर खालिद पहले भी जेएनयू में हुए विवादित प्रदर्शनों में लिप्त रहा था। इस सिलसिले में उस पर राजद्रोह का मुकदमा दर्ज हो रखा है, फिलहाल यह केस अभी अदालत में चल रहा है। चूंकि केंद्र और कई राज्यों में सत्तासीन भाजपा देश के धर्म-निरपेक्ष सिद्धांत की जगह अपने गढ़े राष्ट्रवाद की भावना को बढ़ावा देना चाहती है, इससे ओतप्रोत होकर इसकी छात्र इकाई एबीवीपी संगठन भी कट्टरता का भाव रखती है। कैंपस के अधिकांश विद्यार्थी संघ-परिवार वाले राष्ट्रवाद से किस कदर मतभेद रखते हैं, इसका पता विभिन्न छात्र संघों के संयुक्त प्रदर्शनों में शामिल हुए विद्यार्थियों की भारी संख्या से चलता है, जिसमें उन्होंने अपनी पोस्टर-गर्ल गुरमेहर कौर को विरोध का मुख्य चेहरा बनाकर एबीवीपी द्वारा थोपे जाने वाले राष्ट्रवाद की मुखालफत की थी।
लेडी श्रीराम कॉलेज की छात्रा गुरमेहर कौर के पिता कश्मीर में शहीद हुए थे लेकिन एबीवीपी को लेकर उसने जैसा विरोध जताया है, उसकी एवज में सोशल मीडिया पर उसे धमकियां मिलने लगीं। बाद में गुरमेहर ने यह कहकर खुद को प्रदर्शनों से अलहदा कर लिया कि वह इससे ज्यादा और नहीं सह सकती। परंतु यह बात उजागर हुई है कि बाकी के छात्रों के मन में भी अभिव्यक्ति की आजादी के मुद्दे पर कुलबुलाहट किस कदर तीखी है। उन्हें उस राष्ट्रवाद की लीक पर नहीं चलाया जा सकता जिसकी व्याख्या केंद्रीय गृह राज्यमंत्री किरण रिजिजू के बयानों में मिलती है। अलबत्ता एबीवीपी ने भी अपना जोर दिखाने हेतु बाद में प्रदर्शन-जुलूस का दौर चलाया है।
दरअसल, जिस किस्म के नए राष्ट्रवाद को संघ-परिवार द्वारा बढ़ावा दिया जा रहा है, उसे बृहद छात्र मानस ने सिरे से नकार दिया है। यह स्पष्ट है कि आजादी की लड़ाई के वक्त और बाद में दशकों तक कांग्रेस के शासन के दौरान जो आदर्श स्थापित हुए थे, आरएसएस के नेतृत्व वाला हिंदुत्व-परिवार उनको नापसंद करता है। उसके लिए यह जरूरी बन गया था कि वह छुटपन से ही बच्चों के दिमागों में हिंदू-राष्ट्र बनाने की बात रटवाए, तभी तो उसके द्वारा संचालित प्राथमिक विद्यालयों में छात्रों को इस प्रकार की शिक्षा इस उम्मीद से देनी शुरू की गई थी।
संघ परिवार को पूरा हक है कि वह देशभक्ति की अपनी परिभाषा, जो कैसी भी हो, गढ़ ले, लेकिन इसे दूसरों पर लादना एक नितांत अलग बात है। संघ परिवार भारत को हिंदू-राष्ट्र बनाने वाले अपने ध्येय पर अडिग है और यह भी तय है कि रामजस प्रकरण में मिले झटके के बावजूद वह इस लीक पर कायम रहेगा। हो सकता है कि इससे सबक लेते हुए वह अपने विचारों को आगे बढ़ाने वाली रणनीतियों में कुछ बदलाव लाए। हालांकि फिलहाल सत्ता पर काबिज भाजपा सरकार को वर्तमान समस्या की जटिलता को संभालना होगा। गुरमेहर कौर के लिए दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी का बीच में आना दर्शाता है कि इस प्रकरण की प्रतिक्रिया में कितना जोखिम छुपा हुआ है। रामजस-प्रकरण ने विरोधी दलों के हाथ में सरकार को घेरने के लिए एक बढ़िया मौका मुहैया करवा दिया। एबीवीपी और उनके विरोधियों के बीच जो निरंकुश लड़ाई हुई थी, उसमें बीच-बचाव करने में दिल्ली पुलिस ने जो अरुचि दिखाई है, उन्होंने इसकी जमकर आलोचना की है।
इस सारी कहानी का सार यह है कि संघ-परिवार अभी भी ऐसा सुलभ तरीका ढूंढ़ रहा है, जिसमें कम-से-कम समय में अधिक-से-अधिक लोगों के मनों को अपने सिद्धांतों से प्रभावित किया जा सके। उसे लगा था कि अधपके युवा मस्तिष्कों में यह सब भरने के लिए एबीवीपी एक आदर्श औजार सिद्ध होगी। हालांकि कांग्रेस के राज का सुनहरा वक्त काफी पहले समाप्त हो चुका है लेकिन स्वतंत्रता सेनानियों और देश में पहले-पहल राज करने वाले महानुभावों द्वारा पीछे छोड़े गए धर्म-निरपेक्षता वाले दीगर आदर्श अभी भी बचे हुए हैं और वह युवाओं एवं बड़ों को प्रेरित करने की कूवत रखते हैं।
भारत को हिंदू-राष्ट्र बनाने के अगले अध्याय में संकीर्ण राष्ट्रवाद को बढ़ावा देने हेतु अनेकानेक भाषणों और अपीलों का सिलसिला चलाया जाएगा। लेकिन यह प्रयास अपने प्रथम-परीक्षण-स्थल यानी कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में नाकाम रहा है क्योंकि वहां इसे घास नहीं डाली गई। वामपंथी गुंडों की भांति एबीवीपी को लगता है कि असहमति की आवाज को दबाने का एक ही रास्ता है और वह है बल प्रयोग। टेलीविजन कार्यक्रमों में तर्कपूर्ण बहस के जरिए अपने विरोधियों को परास्त करने वाला रास्ता अख्तियार करने की बजाय संघ परिवार ने नया तरीका यह खोज निकाला है कि कुतर्कों की बौछार करके दूसरे को चुप करवाया जाए।
आरएसएस बखूबी जानता है कि जिस तरह का हिंदू-राष्ट्र वह भारत को बनाना चाहता है वह धारा के विपरीत तैरने जैसा कार्य है और इसे मूर्त रूप दिया जा सके, इसके लिए तय समय-सीमा भाजपा शासन के बचे दिनों से मेल नहीं खाती। जैसा कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में प्रधानमंत्री मोदी के चुनावी भाषणों से पता चलता है कि हिंदू-राष्ट्र बनाने का उद्देश्य फिर से उभारा जा रहा है।

एस. निहाल सिंह

रामजस कॉलेज और दिल्ली यूनिवर्सिटी की अन्य छात्र बिरादरी ने दिखा दिया है कि वे विरोध में उठ खड़े होने और बिना डर के सामने आने को तैयार हैं। अगर किसी वक्ता को केवल इसीलिए प्रतिबंधित किया जाता है कि उसके विचार एबीवीपी या उसके मार्गदर्शक के सिद्धांतों से मेल नहीं खाते तो यह बताता है कि हम एक मुश्किल दौर में पंहुच चुके हैं। ठीक यही रामजस कॉलेज में हो गुजरा परंतु जिस बड़ी तादाद में विद्यार्थियों ने प्रतिरोध किया वह छात्र राजनीति में एक नये रोशन अध्याय का द्योतक है।
अभिव्यक्ति की आजादी बरकरार रखने की भावना छूत की बीमारी की तरह होती है और संघ परिवार को यह एकदम स्पष्ट हो जाना चाहिए कि भले ही वह नादान बच्चों को बरगला लेने में सफल भी हो जाए लेकिन जो उम्र में उनसे बड़े हैं और जिनके युवा विचार खुले गगन में उन्मुक्त उड़ान भरने के लायक हैं, वे उसकी पहुंच से परे ही रहेंगे।