Published On: Mon, Oct 23rd, 2017

मोहिनी उम्र की दहलीज

पुस्तक समीक्षा

फूलचंद मानव
श्रीकृष्णदेव की घोषणा उन्हें उपन्यासकार, कवि और कथाकार जैकेट पृष्ठ चार के अनुसार बता रही है। सन‍् 1946 में जन्मे रचनाकार की पहली कहानी ‘भूखा’ 1964 में छपी। पंजाब यूनि. से शिक्षा पाकर वे कालेजों में पढ़ाकर रिटायर हुए और कुछ सम्मान भी उन्हें मिले हैं। ‘मोहिनी’ उपन्यास उम्र की एक ऐसी दहलीज की कथा बयान करता है जब प्रत्येक युवक जवानी का आनंद लेना चाहता है। लड़कियों का संग-साथ उसे लुभाने लगता है। उम्र की एक जरूरत कभी एक की ओर तो कभी किसी दूसरी ओर उसे सींचती-खींचती है। कमोबेश यही स्थिति, मनोदशा युवाओं की भी इस उम्र में रहती है। सामीप्य, घूमना, फैशन, शृंगार, आकर्षण और न जाने क्या-क्या?
‘मोहनी’ मुख्य पात्र के रूप में कथानक में आई है। रोमांसवादी वातावरण में राजेश और कुछ अन्य पात्र भी कहानी में आते-जाते, अपना अस्तित्व बयान कर रहे हैं। शादी, निकटता, मोहभंग, कशिश, कामना अथवा उम्र के उस पड़ाव का बाहुल्य मोहिनी में डील हुआ है। पिंकी, वीरता, नैनी, सहेली, ड्राइवर कितने ही मुख्य गौण किरदार, तेवर बदलते, सहलाते-लुभाते कथानक को आगे बढ़ाते हैं।
समाज, घर-परिवार, शैक्षिक वातावरण, दैहिक और मानसिक परिस्थितियां एक कथा में बुनी जाती हैं तो वातावरण बनाती हैं। कमल, नीना या कोई सहचर कथानक को गति देता है, राजेश को पहचानता-परखता है तो मनुष्य और मानवता को धकेलता है अथवा उन्हीं के साथ, उनके द्वारा सरकाया भी जाता है। मोहिनी उपन्यास भी नायिका मुक्त है, सामाजिक-पारिवारिक मूल्यों को गति देती है। भाषा, शैली और शिल्प की नजर से यह एक सामान्य कृति है।
0पुस्तक : मोहिनी 0रचनाकार : कृष्णदेव 0प्रकाशक : साहित्य संस्थान, नई दिल्ली 0पृष्ठ संख्या : 104 0मूल्य : रु.250.